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फिर देखिये

अनसुलझे सवालों को सुलझा लीजिए
गंगा किनारे कभी सुबह तो शाम कभी अवध में गुज़ार लीजिए
दिल में दबी उस बात को निकाल दीजिए
इजहार-ऐ-मोहब्बत ना सही,
मन की उस माया को ही निकाल दीजिए
कभी मुस्कराइए तो कभी कभार आँसू ही निकाल दीजिए,
कभी अपने ‘अस्तित्व’ को नकार दीजिए,
फिर देखिये...........

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चाहता हूँ

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