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मुझको मैं प्राप्त हुआ

कुछ खुले-बन्द दरवाज़े हैं, जो अनसुलझे रिश्तों से हैं, जब खुले रहे तब जगा वहम, जब बन्द हुए तब जगा अहम्, तब अनायास ही ज्ञात हुआ, अब मुझको ‘मैं’ प्राप्त हुआ। यूँ नया मेरा अस्तित्व हुआ, खिड़की से मैं था देख रहा, रंगीं शामों की स्याह रात, कभी दूर हुआ कभी पास हुआ, तब जा कर ये एहसास हुआ, अब मुझको ‘मैं’ प्राप्त हुआ।

निखर जाने दो

छलकता है गर अल्फ़ाज़ आँखों से, क़ीमती है, लेकिन छलक जाने दो, मोतियों की माला को टूट कर, इस फ़र्श पर बिखर जाने दो, रु ब रु ख़ुद से हो कर, ख़ुद को भी थोड़ा बिखर जाने दो, जाने भी दो, और जीना सीखो ख़ुद को थोड़ा और निखर जाने दो।

तन मन

चल आपस में बदल लेते हैं, अपने फ़ासलों को भी, तेरे मन और मेरे तन से भी, कम से कम पता ही चल जाए, कि ज़्यादा शातिर कौन है, तन या मन, फिर चाहे वो तेरा हो या मेरा।

काला

सच कहूँ, या फिर कुछ झूठ कहूँ, ख़िदमत में तेरे कुछ ऐसा कहूँ, सोने को मैं पीतल कह दूँ, तन मन को मैं क्यूँ ना दर्पण कह दूँ, तुझसे ना कहूँ अब ज़्यादा सच, लेकिन मैं कहूँगा कान्हा से, तू काला तन से है कान्हा, तेरा मानव, मन से क्यूँ काला रे।

प्रेम की पराकाष्ठा~ पिता

ट्रेन की इस जनरल बोगी में मेरे सामने की सीट पर बैठे बच्चे ने आते ही अपने पिता से मोबाइल ले कर, लूडो खेलना शुरू किया और पिता ने सामान रख कर , उसके और अपने माथे का पसीना पोछा। चंद लम्हों में उसने अपने बच्चे के आँखोंका चश्मा निकाल कर , ट्रेन की मद्धिम रोशनी में देख कर बेहद क़रीने से साफ़ कर के फिर से बच्चे के आँखों पर लगा दिया।बच्चा गेम खेलने में व्यस्त है और उसके पिता मेरे और अपने लिए प्लेटफ़ार्म पर चाय लेने चले गए हैं। ये बिना कुछ माँगे ही दे देना भी और अपना बना लेना भी शायद प्रेम की पराकाष्ठा ही है। अब क़िस्से और कहानियाँ ये एयरकंडिशंड दड़बों में कहाँ मिलते हैं और लग रहा है कि ये तो बस सफ़र का आग़ाज़ है.....

प्रारब्ध

हृदय के भाव का ‘प्रारब्ध’ है, मेरे प्रेम की पराकाष्ठा, ‘अस्तित्व’ होता ही नहीं, है प्रेम जब भी जागता। ये प्रेम बस है जानता, कि वो बस प्रेम ही है माँगता, है वो अनवरत, है अमिट, बन्धन रहित, अहं रहित ये हृदय मेरा जानता, प्रेम में हूँ मैं, ये मानता ।

सफ़र

सफ़र चाहत जो है मेरी, मोहब्बत है, मुक़द्दर है, न रुक पाया, ना रुक सकता, बिछड़ कर कारवाँ से भी, नहीं मायूस हो पाया, ख़ुद से क़ायदे से भी मैं, अलविदा कह नहीं पाया, सफ़र पूरा ना हो पाया।

मैं वापस आ गया हूँ

मृत्यु के परिणाम को, मैं मौन कर के आ गया हूँ, इस जगत के प्रेम का, मैं दाह कर के आ गया हूँ, मन के सारे भ्रमों को, मैं भस्म कर के आ गया हूँ, अब मैं वापस आ गया हूँ, अब मैं वापस आ गया हूँ।

वजह कुछ और ...

वजह कुछ और है, लिखने बैठा जो ख़त तुझे आज, काँप उठी कलम, स्याह हो गयी आँखें, गीले पन्नों सा पसीज गया दिल, लेकिन, इस बार,  वजह कुछ और है। सर्द हवाओं में, तुझे ढूँढता हूँ, तो पाता हूँ, कशिश धुएँ के कश में क़ैद है, गर्माहट बिखर सी गयी है, इन टूटे हुए चाय के कुल्हड़ों में, लेकिन, इस बार, वजह कुछ और है। वो दौर अलग था, ये दौर अलग है, आज भी वही ट्रेन पकड़ता हूँ, दौड़कर, बस वो दौड़ अलग थी, अब दौड़ ये अलग है, हाँफ जाता हूँ अब भी दौड़ कर, लेकिन, इस बार, वजह कुछ और है।

शरद चन्द्र

हूँ सुना राग मल्हार तो मैं, फागुन में चैता सुनता हूँ, मैं राग प्रेम हूँ यौवन का, तो सखा भी हूँ मैं बचपन का, मैं शीतल निर्मल युग-युग से, मुझ पर न किसी का रंग चढ़ा, ना अहंकार का भंग चढ़ा, मैं निर्मोही के सिर पर हूँ, हूँ आदि योगी के केशों में, पर मुकुट बना मैं जन मन का, मैं निशा काल का सूरज हूँ, मैं बढ़ता फिर घटता और होता लोप, हूँ मानव जीवन का असल सोच, धरती से दूर मैं सत्य खड़ा, मैं अटल सत्य चुपचाप खड़ा।

एहसास

मन का मिलना ना मिलना, तेरा मेरा, एक और बात है, तेरा यूँ ही कभी मुस्कुराना, कोई और बात है, और दिलों का यूँ मिलना, कुछ ख़ास बात है, ये कुछ अलग ही एहसास है।

फिर देखिये

अनसुलझे सवालों को सुलझा लीजिए गंगा किनारे कभी सुबह तो शाम कभी अवध में गुज़ार लीजिए दिल में दबी उस बात को निकाल दीजिए इजहार-ऐ-मोहब्बत ना सही, मन की उस माया को ही निकाल दीजिए कभी मुस्कराइए तो कभी कभार आँसू ही निकाल दीजिए, कभी अपने ‘अस्तित्व’ को नकार दीजिए, फिर देखिये...........

मैं

अघोर के कपाल की कल्पना हूँ, क्रोध की काली रात हूँ, दहकती हुई आग हूँ, कपालिक का त्रिशूल हूँ, ताण्डव का अस्तित्व हूँ, बाहर से ही शांत हूँ मैं, अरे! मसान की राख हूँ मैं।

प्रेम का भाव

अहं का अस्तित्वहीन होना, धैर्य की समीक्षा करना, प्रलापों का मौन होना, सत्य को स्वीकारना, और प्रेम का होना, बिलकुल वैसे ही जैसे, दाह में सिर्फ़ शरीर का जलना, मन के दावानल का शान्त होना, और प्रेम की, भीष्म सी प्रतिज्ञा लेना, या फिर दधीच सा त्याग, अन्यथा अभिमन्यु सा बलिदान, ये प्रेम का भाव है, ये यही माँगता है, यही चाहता है।

अलख

यूँ मौन लिए क्यों रहता है, बेचैन है फिर क्यों थमता है, क्यों स्याह हुयी आँखों से, तू बस क्षितिज को देखा करता है, ये जीना भी क्या जीना है, अफ़सोस में रोता रहता है, रे जाग अभी, तो ज्ञान मिले, जब ज्ञान मिले तो प्राण मिले, जो प्राण मिले तो मोक्ष मिले, चल उठ, अब तुझको, मुर्दों की बस्ती में अलख जगाना है, सब ज्ञान बाँट दे उनमें भी, दे प्राण झोंक, अब उनमें भी, अब जा तू जल्दी, देर ना कर, जा अलख जगा, इन मुर्दों में।

प्रेम की पराकाष्ठा - समाहित

आज दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर  इंतज़ार कर रहे अनिकेत की नज़र सामने के प्लेटफार्म पर पड़ी और यकीन नहीं हुआ आँखों को, उसके सामने रक्षंदा खड़ी है , प्लेटफार्म की सीढ़ियों को चढ़ते- उतरते, हाँफते- दौड़ते वो उस प्लेटफार्म पर गया और रुक गया | पहले उसने रक्षंदा को निहारा और फिर आवाज़  लगायी "रक्षंदा", दोनों  ने  एक दूसरे को देखा और हँसते हुए बढे, लगा कि गले मिलने जा रहे हों , लेकिन दोनों के कदम ठिठक से गए, रक्षंदा के साथ उसके कुछ दोस्त भी थे,  बस हाथ मिलाना , थोड़ी ज्यादा  देर तक हाथ मिलाना चलता रहा |  वैसे गले मिलना  समस्या नहीं है वो भी दिल्ली में, लेकिन अनिकेत छोटे शहर से तो बाहर आ गया , लेकिन छोटा शहर उससे बाहर नहीं गया , फिलहाल  समस्या कुछ ही चीज़ों तक सीमित हो चुकी है जैसे कि गले मिलना , बात की शुरुआत करना , ज्यादा करीब बैठना और अनिकेत की ये समस्या भी सिर्फ लड़कियों तक सीमित है | खैर जो भी हो फिलहाल समस्या ये है कि अनिकेत  ने रक्षंदा से झूठ बोल दिया है कि उसकी ट्रेन बहुत ज्यादा लेट है  और रक्षंदा की 'राजधानी एक्सप्रेस ' के बाद वो ट्रे...

प्रेम की पराकाष्ठा ~ रिश्ता

आज कल आप किसी से ज्यादा दिन न मिले-जुले, न ही अक्सर बातें करें, कुल मिलाकर ये कहूँ कि आज के ज़माने में  "टच" में या फिर "कनेक्ट" न रहें तो आप बड़े व्यस्त, स्वार्थी, घमंडी और न जाने क्या-क्या बन जाते हैं, और अगर इनमे से कुछ नहीं बन पाए तो सामने वाला आपको "बड़ा आदमी" तो बना ही देता है,  फिर रिश्तों में वही नाराज़गी, रूठने-मनाने, खिदमत और जद्दोजहद का एक दौर शुरू हो जाता है | रिश्तों का कोई सामाजिक स्तर पर नाम हो या न हो, लेकिन अनिकेत और रक्षंदा का रिश्ता इन सब ताने-बाने से अलग ही था, है और रहेगा | दोनों ही अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त हैं, बातें कभी-कभार हो जाती हैं, और मुलाकात हुए तो बरसों भी बीत जाते हैं, लेकिन कोई शिकवा या शिकायत नहीं होती है | अनिकेत का तो चलो मान भी लें कि उसे रक्षंदा से प्यार है , लेकिन रक्षंदा को तो नहीं है शायद , लेकिन इसके बावजूद भी, रक्षंदा ने कभी भी काफी अरसे पर होने वाली अनिकेत संग बात-चीत या मुलाकातों को लेकर कभी कोई जुमलेबाजी नहीं की | अनिकेत को तो सभी जानते हैं लेकिन रक्षंदा के चरित्र की इस गहराई को तो कोई नहीं जानता, शायद प्रेम तो...

प्रेम की पराकाष्ठा ~ अधूरी बातें (2)

कभी रात के अँधेरे में आप सड़क पर अकेले फूट-फूट कर रोये हैं, वो भी ज़माने बाद | आपको किसी की भी परवाह नहीं होगी उस सन्नाटे में, न कोई आँसू देख सकेगा और न ही सिसकियों की आवाज़ सुन रहा होगा | और कभी बेवजह रोये हैं क्या ? आपको पता ही नहीं चल रहा हो कि आप क्यों रो रहे हैं, समझ ही नहीं पाना कि ये आँसू ख़ुशी के हैं या ग़म के | आज कुछ ऐसा ही अनिकेत के साथ हो रहा था, रात के उस सन्नाटे में, रक्षंदा से मिलने के बाद वो इतनी तेजी से भागा जैसे काटो तो खून नहीं | सबसे ज्यादा कष्ट, सबसे ज्यादा वेदना तभी होती है जब कोई अपना छूटता है | अलविदा कहने के लिए भी आँखों को ही बोलना पड़ता है | और आँखों को क्यों न बोलना पड़े, इंसान के जज्बातों को पूरी सच्चाई से आँखें ही बयां कर सकती हैं | आज कुछ ऐसा ही मंजर था अनिकेत की आँखों में, दोनों, रक्षंदा और अनिकेत  ने बातें ज्यादा तो शिष्टाचार की ही करीं, लेकिन ज़ज्बात बयां करने के लिए तो अनिकेत की डबडबायी आँखें की काफी थी, वैसे रक्षंदा को आज फिर से कुछ भी पता नहीं चल पाया क्यूंकि अनिकेत का प्यार कोई आज कल का परवान चढ़ता प्यार नहीं है बल्कि उसका प्यार ही उसके प्रेम की पराक...

प्रेम की पराकाष्ठा ~ सफर

आज सुबह अनिकेत ने चाय पीना शुरू ही किया था कि तभी मोबाइल में आए  हुए ई-मेल ने एक नया काम पकड़ा दिया, वो भी उसके ऑफिस का । अब ये क्या, आज ही जाना होगा,  वो भी राँची । उसने झुंझला कर अपना फ़ोन बिस्तर पर बड़ी बेरूखी से पटका, और पेपर पढ़ने बैठ गया । अनिकेत ने अभी अपने बॉस को कोसना शुरू ही किया था और  अचानक से उसकी आँखें ही चमक उठी, और भला क्यों न चमक उठती, आज कल रक्षन्दा  भी तो रांची में ही है । अपने एविएटर चश्मे को न जाने कितनी बार पोछ चुके अनिकेत का वो पचास मिनट का हवाई सफर जैसे बीत ही नहीं  रहा हो । वैसे रांची से अनिकेत का पुराना नाता रहा है अपनी पढ़ाई को ले कर, लेकिन इस बार की बेसब्री कुछ और ही बयाँ कर रही थी। उसे तो जल्दी थी, रक्षन्दा को सरप्राइज देने की। वैसे रक्षन्दा उसकी अभी भी बहुत ही अच्छी दोस्त है , और अनिकेत ने आज भी उसे ये एहसास ही नहीं होने दिया की उसे  रक्षन्दा से प्यार है । इस अनकही प्यार की कहानी चली आ रही है, एक अरसे से।  रांची एयरपोर्ट से शहर की तरफ आते हुए, हिनू में एक मॉल खुल गया है , बाकी शहरों की तरह रांची भी बदल...

प्रेम की पराकाष्ठा ~ अधूरी बातें (1)

अनिकेत कभी भी अपने दिल की बात रक्षंदा से नहीं कर सका , रक्षंदा  से अनिकेत का रिश्ता  वाकई में प्रेम से परे था , कम से कम आज कल के प्रेम से तो परे  है ही ।   अनिकेत को रक्षंदा से प्यार तो पहली नज़र में  ही हो गया था , पर इज़हार कभी ना हो सका , होता भी कैसे , जब अनिकेत ने पहली  बार हिम्मत जुटाई तो कंप्यूटर लैब में रक्षंदा अपनी मण्डली को अपने प्यार की एक शानदार तस्वीर से रूबरू  करवा रही थी , तस्वीर की वो लम्बी नीली कार में बैठे उस शख़्स ने , अनिकेत को लम्बी दूरी बनाने के लिए मजबूर दिया । हालाँकि कॉलेज के बाद भी मौके आए कि वो कुछ कहे , लेकिन कभी वक़्त गलत था, तो कभी हालात ।  उनकी शानदार दोस्ती की कहानियाँ बहुत हैं , अनिकेत चाहता तो बहुत कुछ कर सकता था अपने लिए , लेकिन उसने सिर्फ रक्षंदा की ख़ुशी के लिए ही सोचा और हमेशा उसकी नज़र में दोस्त बन कर रह गया । वो कॉलेज की मस्तियों , कॉफी के प्यालों और रक्षंदा की अनमोल दोस्ती में ही खुश रहने लगा ।  उसने कभी भी एहसास नहीं होने दिया कि उसे प्यार भी है ।  रक्...