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प्रेम की पराकाष्ठा ~ अधूरी बातें (2)

कभी रात के अँधेरे में आप सड़क पर अकेले फूट-फूट कर रोये हैं, वो भी ज़माने बाद | आपको किसी की भी परवाह नहीं होगी उस सन्नाटे में, न कोई आँसू देख सकेगा और न ही सिसकियों की आवाज़ सुन रहा होगा | और कभी बेवजह रोये हैं क्या ? आपको पता ही नहीं चल रहा हो कि आप क्यों रो रहे हैं, समझ ही नहीं पाना कि ये आँसू ख़ुशी के हैं या ग़म के | आज कुछ ऐसा ही अनिकेत के साथ हो रहा था, रात के उस सन्नाटे में, रक्षंदा से मिलने के बाद वो इतनी तेजी से भागा जैसे काटो तो खून नहीं | सबसे ज्यादा कष्ट, सबसे ज्यादा वेदना तभी होती है जब कोई अपना छूटता है | अलविदा कहने के लिए भी आँखों को ही बोलना पड़ता है | और आँखों को क्यों न बोलना पड़े, इंसान के जज्बातों को पूरी सच्चाई से आँखें ही बयां कर सकती हैं |

आज कुछ ऐसा ही मंजर था अनिकेत की आँखों में, दोनों, रक्षंदा और अनिकेत  ने बातें ज्यादा तो शिष्टाचार की ही करीं, लेकिन ज़ज्बात बयां करने के लिए तो अनिकेत की डबडबायी आँखें की काफी थी, वैसे रक्षंदा को आज फिर से कुछ भी पता नहीं चल पाया क्यूंकि अनिकेत का प्यार कोई आज कल का परवान चढ़ता प्यार नहीं है बल्कि उसका प्यार ही उसके प्रेम की पराकाष्ठा है | वो अपने आप में अनोखा है, कुछ ख़ास है | बातें तो बहुत ज्यादा हैं करने के लिए, लेकिन अनिकेत ने खुद को शायद किसी समय सीमा से बाँध रखा था , उसकी तमन्ना इतनी ही थी कि वक़्त थम जाए और अगर न थम सके, तो थोड़ा वक़्त और मिल जाए | काश थोड़ा वक़्त और मिल जाए ये शायद सभी की तमन्ना हो, लेकिन अनिकेत का रक्षंदा के पास रहने, उसकी बातें सुनने और बातें करने के लिए, उसे जितना भी वक़्त मिलता वो उसे कम ही लगता | लेकिन वो रक्षंदा से बार-बार कहा कि अब चलता हूँ, काफी देर हो गयी है, और रक्षंदा भी उसे रोकने के लिए अल्फाजों का इस्तेमाल नहीं करती है| "अनिकेत इस रात में कहाँ अकेले जाओगे, रुको, बोलो तो मेरा ड्राईवर या मैं खुद तुम्हे घर छोड़ दूँगी |" लेकिन अनिकेत को इस बात का एहसास था कि एहसासों और जज्बातों का जो सैलाब उसने अपनी आँखों में रोक रखा है, वो रक्षंदा के घर की दहलीज़ पार करते ही बेकाबू हो जाएगा, और वो सही था | अकेले चुप चाप चले जाना ही बेहतर था |

आँसू ख़ुशी के थे या किसी ग़म के, ये ऊपर वाला ही जाने लेकिन, लौटते हुए पलट कर एक बार भी न देखने के लिए भी, कलेजे पर पत्थर रखने का हुनर तो अनिकेत के पास एक ज़माने से है | आँखों में मन की कही - अनकही बातों और जज्बातों का समंदर लिए अनिकेत जैसे ही गली के मोड़ पर पहुंचा, वहाँ उस रात, पान की गुमटी से रेडियो पर फरीदा खानुम का एक गाना "आज जाने की ज़िद ना करो, यूँ ही पहलू में बैठे रहो , हाए मर जायेंगे हम तो लुट जायेंगे , ऐसी बातें किया न करो , आज जाने की ज़िद न करो "  उसके कानों में पड़ा और इधर उसकी आँखों से प्रेम की पराकाष्ठा छलक पड़ी |

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