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प्रेम की पराकाष्ठा~ पिता

ट्रेन की इस जनरल बोगी में मेरे सामने की सीट पर बैठे बच्चे ने आते ही अपने पिता से मोबाइल ले कर, लूडो खेलना शुरू किया और पिता ने सामान रख कर , उसके और अपने माथे का पसीना पोछा।

चंद लम्हों में उसने अपने बच्चे के आँखोंका चश्मा निकाल कर , ट्रेन की मद्धिम रोशनी में देख कर बेहद क़रीने से साफ़ कर के फिर से बच्चे के आँखों पर लगा दिया।बच्चा गेम खेलने में व्यस्त है और उसके पिता मेरे और अपने लिए प्लेटफ़ार्म पर चाय लेने चले गए हैं।

ये बिना कुछ माँगे ही दे देना भी और अपना बना लेना भी शायद प्रेम की पराकाष्ठा ही है।

अब क़िस्से और कहानियाँ ये एयरकंडिशंड दड़बों में कहाँ मिलते हैं और लग रहा है कि ये तो बस सफ़र का आग़ाज़ है.....

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