Skip to main content

तन मन

चल आपस में बदल लेते हैं,
अपने फ़ासलों को भी,
तेरे मन और मेरे तन से भी,
कम से कम पता ही चल जाए,
कि ज़्यादा शातिर कौन है,
तन या मन,
फिर चाहे वो तेरा हो या मेरा।

Comments

Popular posts from this blog

मेरी हर बात जो, तुम्हे है अब बुरी सी लगने लगी, मेरी हर आदतें तुम्हे है अब बुरी सी लगने लगी, वजह है क्या, है जो तुम्हे पता, मुझे बता भी दो, समझ के, नासमझ बनो तो कहते  है  खता, जो भी है, जैसा है, वैसा है हो सकता, न सजा है, न सजा दो, ये भी हमको है पता.

चाहता हूँ

ये उल्फत क्यों अभी तक है, मैं पा लूँ  या उसे खो दूँ , मैं डरता हूँ , जो खो दूँ मैं उसे , तो फ़िर ये  कोई  हार न हो, जो पा लूँ , मैं उसे तो फ़िर , वो उसकी हार ना हो , मैं उस को, इस कदर महसूस करना चाहता हूँ कि सब कुछ हार कर भी, मैं ये पाना चाहता हूँ कि  वो मेरी रहे मन से, करे फ़िर जो भी उस मन से मैं तेरे मन से ही, खुद को समझना चाहता हूँ जरा मैं जान भी तो लूँ, कि  पाना है या खोना है।

प्रेम की पराकाष्ठा ~ अधूरी बातें (1)

अनिकेत कभी भी अपने दिल की बात रक्षंदा से नहीं कर सका , रक्षंदा  से अनिकेत का रिश्ता  वाकई में प्रेम से परे था , कम से कम आज कल के प्रेम से तो परे  है ही ।   अनिकेत को रक्षंदा से प्यार तो पहली नज़र में  ही हो गया था , पर इज़हार कभी ना हो सका , होता भी कैसे , जब अनिकेत ने पहली  बार हिम्मत जुटाई तो कंप्यूटर लैब में रक्षंदा अपनी मण्डली को अपने प्यार की एक शानदार तस्वीर से रूबरू  करवा रही थी , तस्वीर की वो लम्बी नीली कार में बैठे उस शख़्स ने , अनिकेत को लम्बी दूरी बनाने के लिए मजबूर दिया । हालाँकि कॉलेज के बाद भी मौके आए कि वो कुछ कहे , लेकिन कभी वक़्त गलत था, तो कभी हालात ।  उनकी शानदार दोस्ती की कहानियाँ बहुत हैं , अनिकेत चाहता तो बहुत कुछ कर सकता था अपने लिए , लेकिन उसने सिर्फ रक्षंदा की ख़ुशी के लिए ही सोचा और हमेशा उसकी नज़र में दोस्त बन कर रह गया । वो कॉलेज की मस्तियों , कॉफी के प्यालों और रक्षंदा की अनमोल दोस्ती में ही खुश रहने लगा ।  उसने कभी भी एहसास नहीं होने दिया कि उसे प्यार भी है ।  रक्...