Skip to main content

निखर जाने दो

छलकता है गर अल्फ़ाज़ आँखों से,
क़ीमती है, लेकिन छलक जाने दो,
मोतियों की माला को टूट कर,
इस फ़र्श पर बिखर जाने दो,
रु ब रु ख़ुद से हो कर,
ख़ुद को भी थोड़ा बिखर जाने दो,
जाने भी दो, और जीना सीखो
ख़ुद को थोड़ा और निखर जाने दो।

Comments

Popular posts from this blog

चाहता हूँ

ये उल्फत क्यों अभी तक है, मैं पा लूँ  या उसे खो दूँ , मैं डरता हूँ , जो खो दूँ मैं उसे , तो फ़िर ये  कोई  हार न हो, जो पा लूँ , मैं उसे तो फ़िर , वो उसकी हार ना हो , मैं उस को, इस कदर महसूस करना चाहता हूँ कि सब कुछ हार कर भी, मैं ये पाना चाहता हूँ कि  वो मेरी रहे मन से, करे फ़िर जो भी उस मन से मैं तेरे मन से ही, खुद को समझना चाहता हूँ जरा मैं जान भी तो लूँ, कि  पाना है या खोना है।

प्रेम की पराकाष्ठा ~ अधूरी बातें (1)

अनिकेत कभी भी अपने दिल की बात रक्षंदा से नहीं कर सका , रक्षंदा  से अनिकेत का रिश्ता  वाकई में प्रेम से परे था , कम से कम आज कल के प्रेम से तो परे  है ही ।   अनिकेत को रक्षंदा से प्यार तो पहली नज़र में  ही हो गया था , पर इज़हार कभी ना हो सका , होता भी कैसे , जब अनिकेत ने पहली  बार हिम्मत जुटाई तो कंप्यूटर लैब में रक्षंदा अपनी मण्डली को अपने प्यार की एक शानदार तस्वीर से रूबरू  करवा रही थी , तस्वीर की वो लम्बी नीली कार में बैठे उस शख़्स ने , अनिकेत को लम्बी दूरी बनाने के लिए मजबूर दिया । हालाँकि कॉलेज के बाद भी मौके आए कि वो कुछ कहे , लेकिन कभी वक़्त गलत था, तो कभी हालात ।  उनकी शानदार दोस्ती की कहानियाँ बहुत हैं , अनिकेत चाहता तो बहुत कुछ कर सकता था अपने लिए , लेकिन उसने सिर्फ रक्षंदा की ख़ुशी के लिए ही सोचा और हमेशा उसकी नज़र में दोस्त बन कर रह गया । वो कॉलेज की मस्तियों , कॉफी के प्यालों और रक्षंदा की अनमोल दोस्ती में ही खुश रहने लगा ।  उसने कभी भी एहसास नहीं होने दिया कि उसे प्यार भी है ।  रक्...

प्रेम की पराकाष्ठा~ पिता

ट्रेन की इस जनरल बोगी में मेरे सामने की सीट पर बैठे बच्चे ने आते ही अपने पिता से मोबाइल ले कर, लूडो खेलना शुरू किया और पिता ने सामान रख कर , उसके और अपने माथे का पसीना पोछा। चंद लम्हों में उसने अपने बच्चे के आँखोंका चश्मा निकाल कर , ट्रेन की मद्धिम रोशनी में देख कर बेहद क़रीने से साफ़ कर के फिर से बच्चे के आँखों पर लगा दिया।बच्चा गेम खेलने में व्यस्त है और उसके पिता मेरे और अपने लिए प्लेटफ़ार्म पर चाय लेने चले गए हैं। ये बिना कुछ माँगे ही दे देना भी और अपना बना लेना भी शायद प्रेम की पराकाष्ठा ही है। अब क़िस्से और कहानियाँ ये एयरकंडिशंड दड़बों में कहाँ मिलते हैं और लग रहा है कि ये तो बस सफ़र का आग़ाज़ है.....