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शरद चन्द्र

हूँ सुना राग मल्हार तो मैं,
फागुन में चैता सुनता हूँ,
मैं राग प्रेम हूँ यौवन का,
तो सखा भी हूँ मैं बचपन का,
मैं शीतल निर्मल युग-युग से,
मुझ पर न किसी का रंग चढ़ा,
ना अहंकार का भंग चढ़ा,
मैं निर्मोही के सिर पर हूँ,
हूँ आदि योगी के केशों में,
पर मुकुट बना मैं जन मन का,
मैं निशा काल का सूरज हूँ,
मैं बढ़ता फिर घटता और होता लोप,
हूँ मानव जीवन का असल सोच,
धरती से दूर मैं सत्य खड़ा,
मैं अटल सत्य चुपचाप खड़ा।

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चाहता हूँ

ये उल्फत क्यों अभी तक है, मैं पा लूँ  या उसे खो दूँ , मैं डरता हूँ , जो खो दूँ मैं उसे , तो फ़िर ये  कोई  हार न हो, जो पा लूँ , मैं उसे तो फ़िर , वो उसकी हार ना हो , मैं उस को, इस कदर महसूस करना चाहता हूँ कि सब कुछ हार कर भी, मैं ये पाना चाहता हूँ कि  वो मेरी रहे मन से, करे फ़िर जो भी उस मन से मैं तेरे मन से ही, खुद को समझना चाहता हूँ जरा मैं जान भी तो लूँ, कि  पाना है या खोना है।

प्रेम की पराकाष्ठा ~ अधूरी बातें (1)

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