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सफ़र

बड़ी दूर निकल आये हम, मंजिल जो दूर थी, वक़्त का साथ भी न रहा "यथार्थ", वो बड़ा कमबख्त जमाना था, तेरा साथ तो नसीब में भी न था, पर तेरी याद़ो से बस एक ही बात थी, मेरी मंजिल मेरी राहें,चाहे जैसी भी रही हो, मेरा सफ़र एक सुहाना था... . मेरा सफ़र एक सुहाना था......

परवाना

बड़ी तल्खी थी ज़माने के अल्फाजो में किसी दिन, जल गया था एक परवाना किसी गैर की आग में, शमां भी बदनसीब थी, जो जलती रही और जलाती रही न जाने कितने परवानो  को, यूँ ही एक परवाना कहीं और उड़ चला, जलती शमां से दूर, बहुत दूर, पूछने पे बोला, ऐ शमां तू ना बुझना अभी, मै आता हूँ  तेरे पास, इस जमाने को जलाने के बाद, इस जमाने को जलाने के बाद ।

समझ

सब कहानी तेरी मै अब समझ गया, तेरी बातो की तह तक मै पहुँच गया, तेरे हर एक इशारे को मै समझ गया, तेरी हर एक कशिश में हू मै खो सा गया, जिंदा है लोग क्यों यहाँ पे, ये भी मै समझ गया, तेरी दुनिया के पहलुओं से मै वाकिफ हो गया, ऐ खुदा तेरी जन्नतों को मै बखूब समझ गया, चलना होगा मुझे फिर से अपनी उसी डगर, ना मंजिल है ना किनारा, ना कोई किश्ती जहाँ, तेरी जन्नत से बेहतर है  मेरी अनजान डगर, क्यूंकि इस 'अनजान' के अंजाम को, मै समझ गया.   
मेरी हर बात जो, तुम्हे है अब बुरी सी लगने लगी, मेरी हर आदतें तुम्हे है अब बुरी सी लगने लगी, वजह है क्या, है जो तुम्हे पता, मुझे बता भी दो, समझ के, नासमझ बनो तो कहते  है  खता, जो भी है, जैसा है, वैसा है हो सकता, न सजा है, न सजा दो, ये भी हमको है पता.

इन्सां

जो किस्मत की किताबों को, कभी हम यूँ ही पढ़ लेते, तो शायद खुद पता होता, की आगे आज क्या होता, यूँ दिल का दर्द कम होता, तो कोई गम नहीं होता, मगर ऐसा कभी होता, तो हम नादान ही रहते, जिसे न दर्द हो दिल में, वो तो इन्सां नहीं  होता I

क्यों

कालचक्र का रथ है आगे, फिर हम सब क्यों है पीछे, क्षितिज हमेशा मेल दिखाता, फिर हम सब क्यों है बंटते, निर्झर सरिता बहती जाती, फिर हम सब क्यों है ठहरे, अरुणिम वेला है मौन तोड़ती, फिर हम सब क्यों है चुप  रहते.

चुप रहता हू

मन की कोरी कल्पनाओ में जी लेता हू मंजिल की परवाह बिना, मै चल पड़ता हू, खुले हुए दिल से, मै सबसे मिल लेता हू, बंद निगाहों से, मै सब कुछ कह देता हू, नाराज न हो जाये कोई, सो चुप रहता हू जानता हू सब कुछ,  फिर भी मै चुप रहता हू.