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आँखों की बात

आँखों की बात 


ओस जैसी नमी देखी है ,फिर से आज भी
उदासी भी वही देखी है, फिर से आज भी
छिपा लिया हो  पलकों में किसी बात को,
लबों  की आहट में डरा दिया हो, जैसे,  किसी बात को
नहीं मालूम करना है मुझे, उस बात को
सजा दे दो किसी को , बख़्श  दो उस आँख को
वो थक सी हैं गयीं , अब सुन लो उनकी बात को,
ये आँखें  अब नहीं बदलेंगी , माना है 'यथार्थ '
मगर चश्मे बदलने की बात को ही  मान लो । 

Comments

  1. Good one bro.First Time I came to know that you have interest in writting articles too.It's really nice man keep it up...

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  2. आप कवि भी हो? बहूत खूब...

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