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आखिरी बार भी

सर्द रात में बाहर बैठा, मैं एक अकेला,
गर्म चाय के ठन्डे प्याले,
याद दिलाते ठन्डे रिश्ते,
कभी गर्म थे,  जो ऐसे ही,
कहीं खो गए गए जो यूँ ही,

लिखता था जिस स्याही से,
वो प्यार भरे खत, उन रातों को,

सूख गयी  स्याही को, आज फिर पिघलाया हूँ,
पत्थर जैसे दिल को,  मोम सा फिर पिघलाया हूँ ,

आज लिख रहा हूँ , एक आख़िरी पाती ,
जिसे पढ़ लेगा  मेरा वो साथी ,
समझ सकेगा उस रिश्ते को ,
उन बातों को ,

पर समय न होगा ,
कुछ कहने को , कुछ सुनने को
दिल स्याह हो गया होगा
आँखों की दवात सूख गयी होगी ,

लेकिन मुस्कराता मिलूंगा, तब भी ,
तुम्हारे लिए ही , आखिरी बार  भी । 

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