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शांति

 वासनात्मक  सृजन मेरा
वासना से जन्म मेरा
मृत्युलोक में है पदार्पण
ये भोग रूपी एक दर्पण
क्यों करू मै
इस वासना की आज फिर अवहेलना
ये तो सम्भोग रूपी समाधि की है  चेतना
विचलित हो मन
विचलित हो तन
सब शांत हो जो समाधि ले
कलिकाल में अब शांति हो
सम्भोग हो या समाधि हो
निः शब्द हो कर सब कहे
कही शांति हो
कही शांति हो.







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