Skip to main content

चलते रहना

शब्दों के संसार का बंधन,
जीवन का जंजाल ये बंधन,
बंधन का करना है मंथन,
मंथर गति में होता मंथन,
बंधन तोड़ो, मंथन छोडो,
चलो कही, पर, राह न छोडो,
आस ना छोडो, साथ ना छोडो,
चलो दौड़ कर, थकना मत तुम
झुकना मत तुम, रोना मत तुम,
मत करना कोई परिवर्तन,
चाहे हो समक्ष गोवर्धन,
बढ़ते रहना कठिन डगर पर
अगन के पथ में जलते रहना
पर तुम साथी चलते रहना,
जीवन चक्र बढ़ाते रहना,
समय चक्र से आगे जाकर,
ही तुम रुकना,
पर तब तक, ऐ मेरे साथी,
चलते रहना,
चलते रहना.



Comments

Popular posts from this blog

मेरी हर बात जो, तुम्हे है अब बुरी सी लगने लगी, मेरी हर आदतें तुम्हे है अब बुरी सी लगने लगी, वजह है क्या, है जो तुम्हे पता, मुझे बता भी दो, समझ के, नासमझ बनो तो कहते  है  खता, जो भी है, जैसा है, वैसा है हो सकता, न सजा है, न सजा दो, ये भी हमको है पता.

प्रेम की पराकाष्ठा ~ अधूरी बातें (1)

अनिकेत कभी भी अपने दिल की बात रक्षंदा से नहीं कर सका , रक्षंदा  से अनिकेत का रिश्ता  वाकई में प्रेम से परे था , कम से कम आज कल के प्रेम से तो परे  है ही ।   अनिकेत को रक्षंदा से प्यार तो पहली नज़र में  ही हो गया था , पर इज़हार कभी ना हो सका , होता भी कैसे , जब अनिकेत ने पहली  बार हिम्मत जुटाई तो कंप्यूटर लैब में रक्षंदा अपनी मण्डली को अपने प्यार की एक शानदार तस्वीर से रूबरू  करवा रही थी , तस्वीर की वो लम्बी नीली कार में बैठे उस शख़्स ने , अनिकेत को लम्बी दूरी बनाने के लिए मजबूर दिया । हालाँकि कॉलेज के बाद भी मौके आए कि वो कुछ कहे , लेकिन कभी वक़्त गलत था, तो कभी हालात ।  उनकी शानदार दोस्ती की कहानियाँ बहुत हैं , अनिकेत चाहता तो बहुत कुछ कर सकता था अपने लिए , लेकिन उसने सिर्फ रक्षंदा की ख़ुशी के लिए ही सोचा और हमेशा उसकी नज़र में दोस्त बन कर रह गया । वो कॉलेज की मस्तियों , कॉफी के प्यालों और रक्षंदा की अनमोल दोस्ती में ही खुश रहने लगा ।  उसने कभी भी एहसास नहीं होने दिया कि उसे प्यार भी है ।  रक्...

आँखों की बात

आँखों की बात  ओस जैसी नमी देखी है ,फिर से आज भी उदासी भी वही देखी है, फिर से आज भी छिपा लिया हो  पलकों में किसी बात को, लबों  की आहट में डरा दिया हो, जैसे,  किसी बात को नहीं मालूम करना है मुझे, उस बात को सजा दे दो किसी को , बख़्श  दो उस आँख को वो थक सी हैं गयीं , अब सुन लो उनकी बात को, ये आँखें  अब नहीं बदलेंगी , माना है 'यथार्थ ' मगर चश्मे बदलने की बात को ही  मान लो ।